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Monday, August 28, 2006

गोस्वामी तुलसीदास - प्रचलित कथायें एवं विशिष्टाएँ



ऐसा माना जाता है कि तुलसीदास जी वाल्मीकि के अवतार हैं| हिंदू मान्याताओं के अनुसार आत्मा अमर है| वाल्मीकि ने "रामायण" की रचना की थी और उसका पाठ करके लंबे अंतराल तक हिंदू एक सूत्र में बंधते रहे| मैं समझता हूँ कि कालान्तर में संस्कृत भाषा का ह्रास हो जाने के कारण "रामायण" का प्रभाव क्षीण होने लगा होगा तब वाल्मीकि को "रामायण" का रूपांतर "रामचरितमानस" के रूप में करने के लिये तुलसीदास के रूप में अवतार लेना पड़ा होगा|

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Friday, August 25, 2006

वाल्मीकि



महर्षि बनने के पहले वाल्मीकि रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे. वे एक दस्यु थे. दस्युकर्म के मध्य एक बार उन्होंने देखा कि एक बहेलिये ने कामरत क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी. उसके इस विलाप को सुन कर रत्नाकर की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ाः

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वं गमः शाश्वती शमा,
यत्क्रौंच मिथुनादेकं वधीः काममोहितम्..

(अरे बहेलिये, तू ने काममोहित मैथुनरत क्रौंच पक्षी को मारा है. जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी.)

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Wednesday, August 23, 2006

भूमिका



कैसी विडंबना है कि हमारे देश के आज का युवा वर्ग "रामायण" को 'रामानंद सागर' के नाम से जानता है जब कि उसे 'महर्षि वाल्मीकि' एवं 'संत तुलसीदास' के नाम से जानना चाहिये, वैसे ही "महाभारत" को 'बी.आर. चोपड़ा' के नाम से जानता है जब कि उसे 'महर्षि वेद व्यास' के नाम से जानना चाहिये.

मेरा मंतव्य यह नहीं है कि 'रामानंद सागर' और 'बी.आर. चोपड़ा' को नहीं जानना चाहिये, अवश्य ही उन्हेँ भी जानना आवश्यक है क्योंकि "रामायण" और "महाभारत" जैसे महान टी.व्ही. सीरियल बनाने का श्रेय प्राप्त होने के कारण उनका नाम भी भी हिंदू संस्कृति के इतिहास में अमर हो चुका है. परंतु मैं यह कहना चाहता हूँ कि 'महर्षि वेद व्यास', 'ऋषि वाल्मीकि ' और 'संत तुलसीदास' के नाम को कदापि नहीं भुलाया जाना चाहिये. उनका नाम अमर था, अमर है और अमर रहेगा. हाँ यह अवश्य है कि, जैसे बादल के पीछे आने के कारण चंद्रमा कुछ समय के लिये छुप जाता है, उनका नाम भी कुछ समय के लिये विलुप्तप्राय सा हो गया है.

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